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छायावाद की जानकरी, विशेषताएं एवं कवि परिचय

नमस्कार मित्रों आज हम बात करने वाले हैं छायावाद की विशेषताएं जो की परीक्षा की दृष्टि से बहुत ही महत्वपूर्ण होती है छायावाद हिंदी साहित्य में अपनी एक अलग ही पहचान रखता है | छायावाद के कवियों ने क्या योगदान दिया और छायावाद के विकास में किन किन कवियों की महत्वपूर्ण भूमिका रही आज हम इन सभी बातों पर चर्चा करेंगे –

छायावाद की विशेषताएं –

1. प्रकृति का मानवीकरण –

छायावाद के प्रमुख कवियों ने अपनी कविता के माध्यम से प्रकृति के ऊपर मानव के द्वारा किए जाने वाले आरोपों को उजागर किया है | छायावाद की कवियों ने अपनी कविता के द्वारा स्पष्ट किया है कि मनुष्य किस तरीके से प्रकृति का दुरुपयोग करता है और प्रकृति किस तरीके से मनुष्य के लिए वरदान है |

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2. कल्पना की प्रधानता –

छायावाद के कवि अपनी कविताओं में काल्पनिक रचनाओं के माध्यम से अपनी रचना को बहुत ही रोचक और आकर्षक तरीके से लिखा करते थे | छायावाद का कोई भी कवि यदि किसी स्त्री के सौंदर्य का वर्णन करना हो तो वह कल्पना के माध्यम से बहुत ही विस्तार से और रोचक तरीके से लंबे शब्दों में किया गया है |

3. व्यक्तिवाद की प्रधानता –

छायावाद के कवियों ने अपनी कविताओं के माध्यम से स्पष्ट किया है कि लोगों में कितना सुख और दुख भरा पड़ा है लोग कितने परेशान हैं उनके दुखों का क्या कारण है | लोगों के सुख, हर्ष ,उल्लास , आदि सभी के बारे में अपनी कविता के माध्यम से लोगों को उनके दुख दे बाहर उभरने के लिए कविता के द्वारा उपाय बताएं हैं | छायावाद के कवियों ने लोगों की भावनाओं को अपनी कविताओं के माध्यम से प्रकट करने की कोशिश की है |

4.  राष्ट्र के प्रति प्रेम –

छायावाद के कवियों ने राष्ट्र के प्रति प्रेम को अपनी कविता के माध्यम से प्रकट करने का पूरा प्रयत्न किया है | छायावाद का समय लगभग 1918 से 1936 के बीच का समय माना जाता है और इस समय बहुत से युद्ध अपनी चरम सीमा पर थे उन्हें युद्ध को ध्यान में रखते हुए कवियों ने अपनी कविताओं के माध्यम से लोगों को युद्ध के लिए प्रेरित किया है और साहस देने का प्रयास किया है | कवियों ने राष्ट्र के प्रति प्रत्येक व्यक्ति का क्या भाव होना चाहिए और उसे राष्ट्र के प्रति कितना लगाव और प्रेम होना चाहिए इन सभी के ऊपर रचनाओं के माध्यम से गहरी छाप छोड़ी है |

5. प्रकृति प्रेम –

प्रकृति प्रेम को कवियों ने प्रकृति के दुरुपयोग से होने वाले नुकसान और प्रकृति से मिलने वाले मनुष्य को लाभ इन सभी पर अपनी रचनाओं के माध्यम से लोगों को बताया है | प्रकृति के प्रेम मनुष्य का क्या भाव होना चाहिए और मनुष्य को प्रकृति की किस तरीके से रक्षा करना चाहिए इन सभी बातों को कविता के माध्यम से बताया है| कवियों ने प्रकृति के वर्णन से संबंधित कविताओं में बढ़-चढ़कर प्रकृति के बारे में बताया है |

6. नारी के प्रति प्रेम का चित्रण –

छायावाद में नारी के प्रति किस तरीके का प्रेम था ,लोग नारी को किस तरीके से मानते थे ,नारी के प्रति लोगों का क्या भाव था? इन सभी बातों को कवियों ने अपनी कविताओं के माध्यम से दुनिया के सामने रखने का प्रयास किया है | नारी पूरी मानव जाति के लिए पूजनीय होती है नारी का क्या सम्मान होना चाहिए नारी अपने आप में क्या स्थान रखती है इन सभी बातों को रचनाओं के माध्यम से जनमानस के बीच रखा है | छायावाद की समय नारी का शोषण किया जाता था अलग अलग तरीके से तब नारी को सम्मान दिलाने के उद्देश्य दुनिया को नारी का महत्व समझाने का प्रयास किया है |

7. नारी की सुंदरता –

छायावादी कवियों ने नारी की सुंदरता को अपनी कविताओं के माध्यम से दुनिया के सामने प्रकट करने की कोशिश की है नारी को पूजनीय बताया है और कवियों ने अपनी कविता के माध्यम से बताया है कि नारी केवल संभोग की वस्तु नहीं है |

8. आत्मा की अभिव्यक्ति –

छायावाद में सभी कवियों ने अपने अनुभव को ही रचनाओं के माध्यम से पुरानी कुरीतियों और व्यवहारों को जो गलत हैं उनको तोड़ते हुए नई नीतियों को अपनाने के लिए जोर दिया है | आत्मा की अभिव्यक्ति का अर्थ होता है अपनी आत्मा की आवाज को किसी दूसरे व्यक्ति के पास अथवा जनता के पास पहुंचाना | कवियों ने अपनी आत्मा की आवाज को जनता के सामने प्रकट किया है |

9. श्रंगार की भावना –

छायावाद में श्रंगार की भावना को प्रधानता दी गई है छायावाद के कवियों ने श्रंगार अथवा प्रेम से संबंधित कविताओं को लोगों के सामने प्रकट किया है छायावाद की रचनाओं में कवियों के द्वारा हल्का प्रेम देखने को मिलता है  | छायावाद के कवियों ने श्रंगारी काव्य को अधिकतम लिखा है जिसमें श्रंगार अर्थात प्रेम से संबंधित रचनाओं को लोगों के सामने उजागर किया है |

10. जीवन दर्शन –

छायावाद के कवियों ने जीवन के प्रति लोगों की क्या भावना होना चाहिए इसके बारे में गहरी छाप छोड़ी है | कवियों ने बताया है कि मनुष्य का जीवन बहुत ही अनमोल है इसे किसी तरीके से बर्बाद नहीं करना चाहिए इसका सदुपयोग और अच्छे कर्मों में लगाना चाहिए | कवियों ने अपनी कविताओं के माध्यम से बताया है कि लोगों का अपने ही जीवन के प्रति प्रेम होना चाहिए |

छायावाद के प्रमुख कवि और उनकी रचनाएं –

1. सुमित्रानंदन पंत –

सुमित्रानंदन पंत छायावाद के प्रमुख कवि हैं इन्होंने अपनी रचनाओं के माध्यम से छायावाद युग  में बहुत योगदान दिया है | सुमित्रानंदन पंत जी की प्रमुख रचनाएं – वीणा ग्रंथि ,

2. जयशंकर प्रसाद –

जयशंकर प्रसाद जी ने छायावाद के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया है | जयशंकर प्रसाद जी की प्रमुख रचनाओं में कामायनी, आंसू, लहर, झरना प्रमुख है |

3. रामकुमार वर्मा – इनकी प्रमुख रचनाएं रूप राशि, चित्ररेखा और आकाशगंगा है |

4. महादेवी वर्मा – इनकी प्रमुख रचनाएं रश्मि, नीरजा ,निहार है |

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छायावाद युग –

छायावाद  हिंदी साहित्य का रोमांटिक काव्य वाला युग रहा है ,रोमांटिक से तात्पर्य यह युग में आपको प्रेम प्रसंग देखने को मिलेगा  | छायावाद युग का जो समय काल है वह लगभग 1918 से 1936 के बीच का रहा है, 1918 से 1936 में छायावाद में बहुत से ऐसे कवि हुए जिन्होंने छायावाद मे अपनी रचनाओं के माध्यम से इस युग का वर्णन किया है | सुमित्रानंदन पंत, जयशंकर प्रसाद ,महादेवी वर्मा आदि कवियों ने छायावाद में अपनी रचनाओं के माध्यम से छायावाद को बहुत ही स्पष्ट रूप से इस युग में होने वाली घटनाओं का चरित्र चित्रण किया है | जहां महादेवी वर्मा को आधुनिक युग की कवयित्री कहा जाता है वहीं उन्होंने दूसरी ओर छायावाद में ऐसी घटनाओं का चरित्र चित्रण किया है जो बहुत ही प्रभावी हैं | पंडित माखनलाल चतुर्वेदी छायावादी काव्य के प्रतिनिधि कवि माने जाते हैं पंडित माखनलाल चतुर्वेदी की रचनाओं के द्वारा छायावाद में एक अलग ही प्रकाश देखने को मिलता है  |

छायावाद किसे कहते हैं ?

छायावाद की परिभाषा से संबंधित अलग-अलग कवियों ने अपनी अनेकों राय रखी हैं लेकिन छायावाद को स्पष्ट रूप से कहा जा सकता है कि हिंदी साहित्य के काव्य के द्विवेदी युग के पश्चात हिंदी साहित्य के काव्य की जो विषय वस्तु धारा , हिंदी साहित्य का विकास और हिंदी साहित्य में होने वाली क्रियाकलापों, भावों की अभिव्यंजना और जो छायावाद के समय में नवीन पद्धति को लेकर जिन सिद्धांतों को बताया गया है उसी को ‘छायावाद’ कहा गया है |

छायावाद के आधार स्तंभ कौन-कौन हैं ?

छायावाद के चार स्तंभ प्रमुखता माने जाते हैं जिनमें एक कवयित्री महादेवी वर्मा जिनको आधुनिक युग की मेरा भी कहा जाता है | इनके बाद सुमित्रानंदन पंत जोकि छायावाद युग के प्रमुख कवि हैं | सुमित्रानंदन पंत जी के बाद श्री जयशंकर प्रसाद जी जिन की प्रकृति के प्रति गहरी छाप है छायावाद में इनकी रचनाएं स्पष्ट रूप से बहुत ही रोचक और आकर्षक हैं आचार्य श्री जयशंकर प्रसाद जी के बाद आचार्य श्री सूर्यकांत त्रिपाठी निराला जी जिनको केवल” निराला” भी बोला जाता है |

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सूर्यकांत त्रिपाठी निराला जी ने छायावाद में जितनी भी रचनाएं की उनकी प्रत्येक रचना हर घटना को स्पष्ट रूप से दर्शाती है | सूर्यकांत त्रिपाठी निराला जी की रचना आकर्षक और मनमोहक है | वहीं दूसरी तरफ आचार्य श्री जय शंकर प्रसाद जी ने प्रकृति का इतना मनमोहक वर्णन किया है कि छायावाद में अन्य किसी कवि ने इतने रोचक तरीके से और स्पष्ट रूप से प्रकृति का इतना अनोखा वर्णन नहीं किया है | अगर प्रकृति के वर्णन के बारे में कहा जाए तो सबसे पहले कवि का नाम आचार्य श्री जयशंकर प्रसाद जी का ही आएगा क्योंकि इनकी रचना में प्रकृति की अलग ही छटा देखने को मिलती है प्रकृति के प्रति प्रेम इनकी रचना में अलग ही भाव देखने को मिलता है | जयशंकर प्रसाद जी की छायावाद की प्रथम रचना “आंसू” को माना गया है |

छायावाद का अर्थ –

छायावाद के अर्थ में हिंदी साहित्य के अलग-अलग विद्वानों और कवियों का विभिन्न प्रकार से मतभेद है कई कवि छायावाद और रहस्यवाद के संबंध को एक ही तरीके से जोड़ते हैं |

डॉक्टर नागेंद्र जी के अनुसार- “स्थूल के प्रति सूक्ष्म का विद्रोह छायावाद कहलाता है |”

छायावाद का सीधा अर्थ यह होता है कि जब किसी घटना को एक आत्मा से दूसरी आत्मा तक किसी घटना को अथवा चरित्र चित्रण को काल्पनिक रूप से समझा जाए वहां पर छायावाद होता है |

छायावाद के प्रमुख कवि –

  • 1. सूर्यकांत त्रिपाठी” निराला”
  • 2. जयशंकर प्रसाद
  • 3. सुमित्रानंदन” पंत”
  • 4. महादेवी वर्मा

छायावाद और रहस्यवाद में अंतर –

मित्रों छायावाद और रहस्यवाद में कोई ज्यादा विशेष अंतर नहीं है दोनों ही एक दूसरे के समकालीन रहे हैं एक दूसरे से मिलते जुलते हैं इनकी घटनाएं हुई एक दूसरे से संबंध रखती हैं | छायावाद और रहस्यवाद में अंतर कुछ इस प्रकार है –

१. जहां छायावाद में कल्पना की प्रधानता होती है वही रहस्यवाद की रचनाओं में चिंतन की प्रधानता होती है | कल्पना से तात्पर्य रचनाओं को काल्पनिक तरीके से अर्थात गहराई से सोच कर लिखा जाता है और रहस्यवाद में चिंतन करके रचनाओं को लिखा जाता है घटना को समझाया जाता है |

२.  छायावाद में जहां भावना की प्रधानता होती है अर्थात ऐसी घटनाओं का चरित्र चित्रण किया जाता है जो भावनाओं से परिपूर्ण होती हैं वही , रहस्यवाद में ज्ञान की प्रधानता होती है अर्थात ऐसी घटनाओं का चित्रण किया जाता है जिनमें ज्ञान को प्रमुखता केंद्र मानकर लोगों के बीच उस घटना को रखा जाता है |

३. छायावाद में प्रकृति मूलक  होती है प्रकृति मूलक होने से तात्पर्य जिस घटना का छायावाद में चित्रण किया जाता है उसकी प्रकृति अथवा स्वभाव को घटना में जरूर बताया जाता है जबकि, रहस्यवाद में घटनाओं की प्रकृति को दार्शनिक तरीके से बताया जाता है |

४ . छायावाद में जिस घटना का वर्णन किया जाता है उसमें आत्मा से रूबरू किया जाता है अर्थात आत्मा के दर्शन होते हैं | या अपन कह सकते हैं कि छायावाद में किसी घटना को एक आत्मा से दूसरी आत्मा तक काल्पनिक तरीके से पहुंचाया जाता है | जबकि, रहस्यवाद में ईश्वर की आभा के दर्शन होते हैं आभा से तात्पर्य ईश्वर का आभास होता है |

५. छायावाद में स्थूल के प्रति सूक्ष्म का विद्रोह  बताया गया है जबकि, रहस्यवाद में घटना के कण-कण में ईश्वर  के होने का आभास होता है|

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छायावाद का अंग्रेजी अर्थ –

छायावाद को अंग्रेजी में – ” ROMANTICISM ” कहा जाता है जो एक प्रकार की Noun है अर्थात संज्ञा है |

छायावाद का आधुनिक काल –

दोस्तों छायावादी युग की शुरुआत है हिंदी साहित्य काव्य की द्विवेदी युग के पश्चात हुई है छायावादी युग का जो समय है 1918 – 1936 के बीच का समय माना जाता है |  हिंदी साहित्य के प्रमुख कवि आचार्य शुल्क जी छायावादी युग की शुरुआत 1918 से मानते हैं क्योंकि इस समय छायावादी युग के प्रमुख कवि जयशंकर प्रसाद, सुमित्रानंदन पंत, महादेवी वर्मा ,सूर्यकांत त्रिपाठी निराला जैसे महान कवि हुए और इनके द्वारा एक से एक महत्वपूर्ण रचनाओं का अध्ययन किया गया | आचार्य श्री जयशंकर प्रसाद जी की रचना कामायनी 1936 में प्रकाशित हुई यह समय प्रगतिशील कवियों के साथ प्रगतिशील रचनाओं को प्रकाशित किया गया |  1936 में ही प्रगतिशील लेखक संघ की स्थापना की गई यह हिंदी साहित्य का बहुत ही महत्वपूर्ण विषय था |

छायावादी आलोचना –

हिंदी साहित्य में जयशंकर प्रसाद जैसे कवि मूलतः ब्रज भाषा के कवि थे लेकिन इनकी रहस्यवाद और छायावाद से संबंधित बहुत ही घटनाओं के ऊपर इन्होंने चरित्र चित्रण किया| हिंदी साहित्य में 1918 से 1936 के समय के अंतर्गत जितनी भी घटनाओं को अपनी रचनाओं के माध्यम से वर्णित किया है जहां पर उचित था वहां पर कठोर प्रहार भी किया है और यदि कोई नियम और घटना गलत तरीके से हुई है तो वहां पर आलोचना करने में भी कोई कमी नहीं छोड़ी | छायावादी कवियों की खास विशेषता रही है कि छायावादी युग में समाज में होने वाली कुरीतियों को रोकने के लिए कवियों से जितना हो सका उतना उन्होंने समाज वह कविताओं के माध्यम से अथवा रचनाओं के माध्यम से समझाने का प्रयत्न किया है | समाज में होने वाली दुर्दशा के खिलाफ आलोचना भी की है |

छायावाद का आरंभ –

छायावादी युग का प्रारंभ द्विवेदी युग के बाद 1918 से 1936 के समकालीन माना जाता है इस समय गद्य भाषा का भी विकास हुआ है | छायावादी युग में खड़ी बोली का प्रयोग बहुत से कवियों ने अपनी रचनाओं के माध्यम से किया है इस प्रकार” खड़ी बोली का स्वर्ण युग “भी छायावादी युग को कहा जाता है |

छायावाद का इतिहास –

दोस्तों अगर छायावाद की इतिहास की बात की जाए तो छायावाद द्विवेदी युग के पश्चात हिंदी साहित्य में देखने को मिलता है | दोस्तों छायावाद के इतिहास के बारे में जानने से पहले छायावाद के नामकरण की बात करते हैं तो छायावाद का नाम हिंदी साहित्य के प्रमुख कवि “मुकुटधर पांडे ” जी ने छायावाद का नाम दिया है |
मुकुटधर पांडे जी के द्वारा सर्वप्रथम छायावाद से संबंधित चार रचनाओं का जबलपुर पत्रिका से प्रकाशन किया गया जिसमें “कुररी के प्रति “मुकुटधर पांडे जी की छायावाद की प्रमुख कविता थी |
इस कविता को श्री शारदा पत्रिका से 1920 में प्रकाशित किया गया था |

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छायावाद और प्रगतिवाद में अंतर –

दोस्तों छायावाद और प्रगति बाद में विशेष अंतर नहीं छायावाद और प्रगतिवाद में जिन काव्यों का वर्णन किया गया है उनमें स्पष्ट रूप से कवियों ने वर्णन किया है |

1. छायावाद में जहां कवियों ने अपनी रचनाओं में प्रकृति के चित्रण को स्पष्ट रूप से प्रधानता दी है जबकि, प्रगतिवाद में जनमानस में होने वाली कुरीतियों से संबंधित रचनाओं का वर्णन किया गया है |

2.  छायावादी काव्य में हिंदी साहित्य की भाषा का प्रयोग किया गया है कवियों ने हिंदी साहित्य की भाषा को ही अपनी रचनाओं का माध्यम बनाया जबकि, प्रगतिवाद में स्पष्ट रूप से सरल भाषा का प्रयोग किया गया है | 

3. छायावादी काव्य जयशंकर प्रसाद जैसे महान कवि हुए और इनके अलावा भी अन्य कवियों ने छायावादी काव्य में अलंकार की प्रधानता दी है जबकि , प्रगतिवाद में जन रचनाओं का वर्णन किया गया है वे रचनाऐ अलंकार मुक्त  हैं अर्थात अलंकार नहीं होता है|

4. छायावाद के काव्य का वर्णन प्रतीक शैली में होता है जबकि प्रगतिवाद मे काव्य का वर्णन सरल, सुबोध ,स्पष्ट शैली में होता है |

छायावादी रस –

छायावाद में प्रमुखत: श्रंगार रस का प्रयोग किया गया है श्रृंगार रस में भी प्रेम से परिपूर्ण  स्पष्ट रूप से अलग ही तरीके से रचनाओं का वर्णन किया गया है | छायावादी युग में जिन काव्य को लिखा गया है उनमें स्त्री के प्रति प्रेम की क्या भावना होना चाहिए इस्त्री केवल संभोग की वस्तु नहीं है इस बात पर सबसे ज्यादा जोर दिया गया है| नारी के सम्मान के प्रति लोगों की क्या भावना होना चाहिए समाज में होने वाली कुरीतियों पर अपनी आलोचना संबंधी काव्य को जनमानस में प्रचलित किया है |

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