सागर जिला | Sagar District Wise GK History Tourism

SAGAR TOURISM PLACE

हेलो दोस्तों !आज हम बात करने वाले हैं जिला सागर के बारे में जो कि मध्य प्रदेश का ह्रदय जिला कहलाता है | मध्यप्रदेश में सागर जिला बुंदेलखंड का सबसे महत्वपूर्ण भाग है जिसका इतिहास बहुत पुराना है | दोस्तों आज हम बात करने वाले हैं जिला सागर के बारे में जिसके अंतर्गत बहुत पुराने तालाब पाए जाते हैं जिनका इतिहास बहुत पुराना है | दोस्तों आज हम बात करने वाले हैं सागर जिले के अंतर्गत आने वाले सभी पर्यटक स्थलों के बारे में जिसमें हम आपको बताएंगे कौन – कौन से पर्यटक स्थल जिला सागर में पाए जाते हैं और इनका क्या महत्व है |

सागर मध्य प्रदेश का एक ऐसा जिला है जहां से कर्क रेखा गुजरती है| यह कर्क रेखा सागर जिले के दक्षिण दिशा से होकर जाती है |

प्रसिद्ध अभिलेखएरण अभिलेख
सती प्रथा के साक्ष्यएरण अभिलेख
शासनडोंगी साम्राज्य की राजधानी
मंदिरगढ़पहरा मंदिर
पर्यटक स्थलरंगीरो और हरसिद्धि माता का मंदिर, रहली का सूर्य मंदिर
प्राचीन महलखिमलासा
अभ्यारणनौरादेही वन्यजीव अभ्यारण
जलप्रपातराहतगढ़
झीलबड़ी झील सागर, लाखा बंजारा
उद्योगतेल रिफाइनरी बीना
नदियांधसान ,बीना ,बामनेर ,बेवस और सुनार
विश्वविद्यालयसागर विश्वविद्यालय
गार्डनबॉटनिकल गार्डन
कसाई खाना आंदोलन1920 सागर से शुरू
गुफाएंआबचंद की गुफाएं

सागर जिले की प्रमुख नदियां–

दोस्तों सागर जिले की प्रमुख नदियां धसान ,बीना ,बामनेर, बेवस और सुनार प्रमुख नदियां हैं | दोस्तों धसान नदी टीकमगढ़ जिले से होकर जाती है यह नदी काफी बड़ी और गहरी है | सागर जिला वर्तमान में बहुत ही व्यक्तित्व और समृद्धि शाली जिला हो गया है|

बीना रिफाइनरी कंपनी —

सागर जिले के अंतर्गत बीना शहर में आने वाली रिफाइनरी कंपनी जिसे बीना रिफाइनरी के नाम से जाना जाता है | यह कंपनी बीना के आगासोद गांव में स्थित है जिसकी स्थापना ओमान के सहयोग से हुई थी | वर्तमान में यह कंपनी कार्यरत है |

1.सागर विश्वविद्यालय —

दोस्तों सागर विश्वविद्यालय का इतिहास बहुत ही पुराना है किसी एक व्यक्ति के दान में दी गई भूमि पर यह विश्वविद्यालय निर्मित किया गया है | सागर विश्वविद्यालय की स्थापना सन 1946 में डॉ हरिसिंह गौर के द्वारा की गई | सन 1946 में सागर विश्वविद्यालय का नाम केवल सागर विश्वविद्यालय तक ही सीमित था लेकिन 1983 के बाद सागर विश्वविद्यालय का नाम बदलकर डॉक्टर हरिसिंह गौर विश्वविद्यालय रख दिया गया | दोस्तों धीरे-धीरे 27 मार्च 2008 तक डॉ हरिसिंह गौर विश्वविद्यालय केंद्रीय विश्वविद्यालय बन गया | डॉ हरिसिंह गौर विश्वविद्यालय देश प्रदेश में बहुत ही चर्चित और उत्कृष्ट विश्वविद्यालय माना जाता है इस विद्यालय की सबसे खास बात यह है कि किसी एक व्यक्ति के द्वारा अपनी पूरी संपत्ति को दान करने के बाद इस विश्वविद्यालय की स्थापना हुई |

आज तक ऐसा कोई भी विश्वविद्यालय निर्मित नहीं हुआ जो किसी व्यक्ति के द्वारा दान की गई संपत्ति के द्वारा निर्मित किया गया हो | डॉ हरिसिंह गौर विश्वविद्यालय मध्य प्रदेश राज्य का एकमात्र केंद्रीय विश्वविद्यालय बन गया है | डॉ हरिसिंह गौर विश्वविद्यालय का क्षेत्रफल बहुत ही बड़ा और विशाल है इस विश्वविद्यालय की तुलना किसी अन्य विश्वविद्यालय के करना आसान नहीं है | डॉक्टर हरिसिंह गौर विश्वविद्यालय एशिया का एकमात्र ऐसा विश्वविद्यालय है जिसका क्षेत्रफल सबसे अधिक है |

सागर विश्वविद्यालय के अंतर्गत वनस्पति विज्ञान जीव विज्ञान आदि को बहुत ही विस्तार से अर्जित किया जा सकता है | सागर विश्वविद्यालय से पढ़ाई पूरी करने के बाद बहुत से विद्यार्थी वर्तमान में वैज्ञानिकों की तरह स्पेस एजेंसियों में कार्यरत हैं |

सागर विश्वविद्यालय मध्य प्रदेश का एक ऐसा विश्वविद्यालय जहां पर उप निरीक्षण अर्थात एस आई की ट्रेनिंग करवाई जाती है |

महार रेजिमेंट सागर–

मध्य प्रदेश के सागर जिले में महार रेजीमेंट है जोकि भारतीय सेना का स्थल केंद्र है | भारतीय सेना का मध्य प्रदेश के अंतर्गत एक छोटा सा मुख्यालय है जिसे महार रेजीमेंट के नाम से जाना जाता है |

बॉटनिकल गार्डन–

सागर विश्वविद्यालय के अंतर्गत बॉटनिकल गार्डन मौजूद है बॉटनी के विद्यार्थी सागर विश्वविद्यालय में अध्ययन करके बड़े बड़े अधिकारी बनते हैं | मध्यप्रदेश का सागर विश्वविद्यालय एकमात्र ऐसा विश्वविद्यालय है जहां पर अपराध शास्त्र से संबंधित डिग्री की उपलब्धि होती है और अपराध शास्त्र के बारे में सिखाया जाता है |

बॉटनिकल गार्डन-- Sagar MP

सागर की लाखा बंजारा झील —

सागर की लाखा बंजारा झील बहुत ही पुरानी और ऐतिहासिक झील है इस झील का निर्माण किया गया था जब सागर परकोटा नामक गांव के रूप में बसाया गया था | वर्तमान में लाखा बंजारा झील में पानी तो है लेकिन यह पानी बहुत ही प्रदूषित हो चुका है | प्रशासन की तरफ से लाखा बंजारा झील की सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण प्रयास किए जा रहे हैं जिससे इसका पानी प्रदूषित ना हो | लाखा बंजारा झील पर वर्तमान में मध्य प्रदेश सरकार के द्वारा झील की सुरक्षा के लिए पुनः निर्माण किया जा रहा है | यह झील बहुत पुरानी होने के कारण और ऐतिहासिक होने से पर्यटकों के लिए दर्शनीय स्थल है|

दोस्तों यही दिन जो कि सागर जिले का केंद्र है इसका उपयोग स्नान करने खेती करने नहाने आदि के लिए उपयोग में लाई जाती है हालांकि वर्तमान में प्रदूषित होने के कारण लोग इसमें बहुत कम नहाते हैं | इस झील का विस्तार लगभग 400 एकड़ से भी अधिक में फैला हुआ है |

रहली का सूर्य मंदिर —

सागर जिले के अंतर्गत आने वाला रहली का सूर्य मंदिर पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र है | रहली का सूर्य मंदिर बहुत ही सुंदर और आकर्षक लगता है क्योंकि यह मंदिर सागर जिले में बहने वाली दो छोटी नदियां सोनार और देहात नदी के तट पर बना हुआ है जिस कारण से इस मंदिर की सुंदरता बहुत अनोखी लगती है | नदियों के संगम पर बना यह मंदिर हम लोगों के लिए पर्यटक का केंद्र बन चुका है जहां पर सागर जिले का भ्रमण करने वाले लोग एक बार रहली मंदिर जरूर देखने जाते हैं | रहली के मंदिर के पास ही महादेव का मंदिर है जो की बहुत ही पुराना मंदिर है | रहली के मंदिर के पास में बना महादेव का मंदिर जिसमें भगवान भोलेनाथ की सुंदर शिवलिंग स्थापित है यह शिवलिंग बहुत ही सुंदर और आकर्षक लगती है |

कसाई खाना आंदोलन की शुरुआत —

दोस्तों सन 1920 में कसाई खाना आंदोलन मध्य प्रदेश के सागर जिले से ही शुरू हुआ था | कसाई खाना आंदोलन मध्यप्रदेश में बुंदेलखंड के क्षेत्र का प्रथम आंदोलन था | कसाई खाना 1920 के पहले अंग्रेजी शासन के द्वारा सागर जिले के रत्नों ना नामक स्थान पर पशु वध केंद्र के रूप में स्थापित किया गया था | कसाई खाना का विरोध प्रदर्शन में यह आंदोलन अंग्रेजी शासन के खिलाफ शुरू किया गया था | इस आंदोलन का नेतृत्व अब्दुल गफ्फार और पंडित माखनलाल चतुर्वेदी नेतृत्व किया था | दोस्तों कसाई खाना सागर जिले के रत्ना नामक स्थान पर आज भी ऐतिहासिक रूप से देखा जा सकता है | प्राचीन काल का कसाई खाना वर्तमान में पर्यटक के रूप में जाना जाता है जहां पर कई लोग इसे देखने के लिए आते हैं | दोस्तों प्राचीन काल के कसाई खाना के बारे में जो कोई भी एक बार कहीं से भी सुनता है तो सागर के कसाई खाने को देखने की जरूर कोशिश करता है |

सागर का गढ़पहरा मंदिर —

दोस्तों सागर जिले में स्थित गढ़पहरा मंदिर लोगों के लिए एक दर्शनीय स्थल होने के साथ-साथ पर्यटन का प्रमुख केंद्र है | दोस्तों सागर से करीब 15 किलोमीटर की दूरी पर स्थित यह मंदिर बहुत ही प्राचीन और ऐतिहासिक है जिसकी बनावट अन्य मंदिरों की तुलना में पूरी तरीके से भिन्न है | आज के समय में किसी भी कारीगर के द्वारा ऐसा मंदिर बनाया जाना बहुत ही मुश्किल जान पड़ता है | सागर के गढ़पहरा में डांगी साम्राज्य का आना-जाना और निवास स्थल रहा है | डांगी साम्राज्य ने सागर में ऐतिहासिक काल के दौरान अपना साम्राज्य स्थापित कर रखा था |

ERAN या ऐराना –

सागर जिले से करीब 6 मील की दूरी पर स्थित लगभग 15 किलोमीटर दूर सागर जिले में बहने वाली बीना नदी और रेवता नदी के संगम पर यह पर्यटक स्थल मौजूद है | ऐरण के पास में ही बामोरा स्टेशन पाया जाता है जोकि लगभग 13 किलोमीटर के आसपास है जहां से इस पर्यटक स्थल के लिए आने जाने की संपूर्ण सुविधा उपलब्ध हो जाती है | दोस्तों यह एक ऐसा पर्यटक स्थल है जहां पर कहा जाता है मध्य प्रदेश का एकमात्र सती प्रथा के साक्ष्य मिले हैं | दोस्तों सागर जिले की एरण अभिलेख पता चलता है कि यहां पर सती प्रथा पूरी तरीके से इतिहास काल में रही है | दोस्तो किस अभिलेख को देखने के लिए लोग दूर-दूर से आते हैं इतिहास की प्राचीन धरोहर होने के कारण यह पर्यटन स्थल काफी चर्चे तो और फेमस है |

रंगिरो-

दोस्तों रेहली से करीब 25 किलोमीटर की दूरी पर यह है स्थित एक साधारण गांव है जहां पर महाराजा छत्रसाल और धामोनी की मुगल फौजदार खाले के के बीच सगाई हुई थी जिस कारण से यह स्थल बहुत ही प्रसिद्ध है | सागर जिले से करीब 55 किलोमीटर की दूरी पर यह स्थल दूर होने के कारण और इसका रास्ता थोड़ा कठिन होने के कारण यहां पर लोग बहुत कम ही जाते हैं |

इस गांव की बगल की पहाड़ी पर हरसिद्धि देवी का मंदिर मौजूद है जोकि बहुत ही प्राचीन और प्रसिद्ध है जिसे देखने के लिए हजारों लोग नवरात्रि के महीने में आते हैं | हरसिद्धि देवी के आसपास रहने वाले लोगों के द्वारा पता चलता है कि इस मंदिर में विराजमान देवी प्रतिदिन लगभग तीन बार अपना रूप बदलती है | दोस्तों रूप बदलने वाली यही देवी प्रदेश का एकमात्र ऐसा मंदिर है जहां पर इतनी प्रसिद्धि पाई जाती है | चैत के महीने में यहां पर एक मेला भी लगता है जिस दौरान हजारों की संख्या में भीड़ उमड़ आती है | यह मंदिर पहाड़ी पर होने के कारण काफी आकर्षक लगता है इस कारण से दूर -दूर से लोग दर्शन करने के लिए आते हैं |

राहतगढ़ जलप्रपात सागर–

दोस्तों भोपाल से करीब 60 किलोमीटर दूर भोपाल रोड पर स्थित राहतगढ़ अपनी प्राचीनता पुराने खंडहर और महिलाओं के लिए जाना जाता है | दोस्तों राहतगढ़ के पास ही बीना नदी के तट पर स्थित 1883 के समय का राहतगढ़ का किला मौजूद है जो कि बहुत ही प्राचीन और उत्कृष्ट शैली के रूप में निर्मित है जिसकी छटा बहुत ही सुंदर लगती है | दोस्तों राहतगढ़ के लिए को बनवाने के पीछे बहुत बड़ा जमीनी एरिया कब्जे में करना था | जब राहतगढ़ किले का निर्माण किया गया तब करीब 65 एकड़ से भी अधिक की जगह को घेरने के लिए एक दीवार का निर्माण किया गया |

राहतगढ़ किले के पास ही में एक झरना मौजूद है जिसे राहतगढ़ झरना भी कहा जाता है | बड़ी-बड़ी और विशाल चट्टानों के बीच यह बहता हुआ झरना लोगों को बहुत ही आकर्षक लगता है | भोपाल जिले की यह सबसे सुंदर जगह है जिसे देखने के लिए पर्यटक विदेशों से भी आते हैं | राहतगढ़ झरना का पानी पत्थरों के बीच में बीच से गिरता है जिसे देखने के बाद एक अलग ही आनंद की अनुभूति होती है प्रकृति का सुनहरा चरित्र चित्रण देखने को मिलता है | राहतगढ़ जलप्रपात का पानी लगभग 50 फीट की ऊंचाई से गिरता है जिससे इसका पानी एकदम सफेद दूध की तरह दिखता है| राहतगढ़ झरना को देखने के लिए ज्यादातर लोग सर्दियों के मौसम में जाते हैं |

राहतगढ़ जलप्रपात सागर

नौरादेही वन्यजीव अभ्यारण–

सागर में ही मौजूद नौरादेही वन्यजीव अभ्यारण जीव जंतुओं और जानवरों के लिए एक सुरक्षित और जीवन यापन के लिए बहुत ही सुंदर जगह है क्योंकि यहां पर पानी की उपयुक्त व्यवस्था है | नौरादेही वन्यजीव अभ्यारण सागर जिले के अलावा सागर, दमोह ,नरसिंहपुर जिले तक फैला हुआ है | नौरादेही वन्यजीव अभ्यारण सागर जिले की लगभग 1200 वर्ग किलोमीटर से अधिक यह क्षेत्रफल पर फैला हुआ है |

नौरादेही वन्यजीव अभ्यारण प्रमुख रूप से जीवों के संरक्षण का केंद्र है और इस वन्य जीव अभ्यारण में जैव विविधता आपको प्रमुख रूप से देखने को मिलेगी | दोस्तों नौरादेही वन्यजीव अभ्यारण के अंतर्गत शुष्क पर्णपाती वन पाए जाते हैं जिसमें सागौन के पौधों की अधिकता प्रमुख रूप से देखने को मिलती है |

नीलगाय, चिंकारा, चीतल ,सांभर ,ब्लैकबक बहुत देर से जानवर पाए जाते हैं जो नौरादेही वन्यजीव अभ्यारण के अंदर ही मौजूद हैं| नौरादेही वन्यजीव अभ्यारण के अंतर्गत आने वाले सभी जीव जंतु अपनी पानी की आवश्यकता को नौरादेही वन्यजीव अभ्यारण के अंतर्गत आने वाली नदियों के माध्यम से ही पूरा करते हैं | नौरादेही वन्यजीव अभ्यारण के अंतर्गत आने वाली बमनेर और बियरम नदी पाई जाती हैं जिनकी सबसे जल्दी नौरादेही वन्यजीव अभ्यारण के जीव जंतु अपना जीवन यापन करते हैं |

नौरादेही वन्यजीव अभयारण्य बहुत 30 तारीख तरफ जीव-जंतु भी पाए जाते हैं जिनमें कछुआ, मॉनिटर छिपकली और ताजे पानी के कछुए पाए जाते हैं | दोस्तों वन्यजीव संरक्षण अधिनियम के आधार पर नौरादेही वन्यजीव अभ्यारण के जीव-जंतुओं को सुरक्षित और उनके जीवन को सुरक्षा प्रदान करने के लिए सरकार ने वन्य जीव संरक्षण के कानूनों को भी बहुत ही सख्त रखा है |

वन्य जीव अभ्यारण के अंतर्गत आने वाले सभी जीव जंतुओं की सुरक्षा करना हमारा दायित्व है | जीव जंतुओं की सुरक्षा के लिए सरकार ने भी बहुत ही कड़े नियम पारित किए हैं |

खिमलासा–

खिमलासा के बारे में बहुत कम लोग ही जानते हैं क्योंकि यह बहुत ही प्राचीन और छोटा सा ऐतिहासिक कितनी तेज जुड़ा हुआ एक छोटी इमारत है | खिमलासा की स्थापना के बारे में कहा जाता है कि इसकी स्थापना एक मुसलमान पुली ने ने की थी जिसका संबंध मालवा के सूबेदार राजस्थान सरकार के अंतर्गत आने वाला एक अनोखी इमारत होती थी |

कुछ लोगों का कहना है कि खिमलासा एक बहुत ही पुराना खंडहर के रूप में छोटा सा खिला हुआ करता था जिसका अस्तित्व केवल बहुत कम ही रह गया है | दोस्तों हजारों साल पुराना होने के कारण यह काफी मिट चुका है ऐतिहासिक होने के कारण सरकार को इस पर विशेष ध्यान देना चाहिए और इसकी सुरक्षा करना चाहिए ताकि ऐतिहासिक धरोहर सुरक्षित रह सके | खिमलासा को गढ़ोल किला के रूप में भी जाना जाता है इसकी विशेषता यह है कि इसमें केवल आने जाने के लिए एक ही दरवाजा है | दोस्तों आज तक जितने भी के लिए निर्मित किए गए हैं उनमें ऐसा एक भी अकेला नहीं है जिसमें केवल आने जाने के लिए एक ही दरवाजा के लिए मैं हमेशा 4 दरवाजे से अधिक मुख्य दरवाजे हुआ करते थे इसके अलावा अन्य दरवाजे भी अलग ही रणनीति के द्वारा बनाए जाते थे |

आबचंद की गुफाएं–

दोस्तों बहुत पुरानी और ऐतिहासिक गुफा होने के कारण आपचंद की गुफा पर्यटन के आकर्षण का केंद्र बन चुकी हैं जहां पर प्रतिदिन सैकड़ों की संख्या में लोग भ्रमण करने के लिए आते हैं | आबचंद की गुफा पूर्ण रूप से पत्थर की हैं और यह गुफाएं गधेरी नदी के घने जंगलों के पास स्थित हैं | सागर जिले से लगभग 35 किलोमीटर की दूरी पर जिला दमोह रोड पर गधेरी नदी के घने जंगलों में यह गुफाएं स्थित हैं गुफाओं के चारों तरफ घनी झाड़ियां भी हैं | दोस्तों यह गुफाएं बहुत पुरानी होने के कारण यहां पर मौजूद शैलों पर कुछ लिपियां भी लिखी हैं जिनको पढ़ना बहुत कठिन है |

दोस्तों आब चंद की गुफाओं तक जाने के लिए आपको सागर जिले से दमोह रोड 35 किलोमीटर की दूरी पर गधे की नदी के पास जाना होगा | गधेरी नदी के पास ही घने जंगलों में यह गुफाएं स्थित हैं | घने जंगलों में होने के कारण यहां पर बहुत कम लोग ही जा पाते हैं परंतु यहां का दृश्य बहुत ही मनोरम और आकर्षक लगता है | यहां पर जाने के बाद इतिहास के बारे में बहुत ही अनोखी जानकारी मिलती है | यहां तक जाने के लिए वर्तमान में बहुत ही शानदार रास्ता निर्मित किया गया है जिस कारण से यहां पर पर्यटकों का आना-जाना लगा रहता है |

दोस्तों इन गुफाओं का रहस्य बहुत पुराना है जिसके बारे में वहां पर जाकर ही पता चलता है यहां पर मकर संक्रांति के दौरान एक मेला भी लगता है जिसे गुफा मेला कहा जाता है | दोस्तों यह गुफा करीब 20 फीट से भी अधिक गहरी है |

आबचंद की गुफाएं-- Sagar

सागर जिला | Sagar District Wise GK History Tourism FAQ’s

प्रश्न- 1.लाखा बंजारा झील कहां पर है?

दोस्तों लाखा बंजारा झील मध्य प्रदेश के सागर जिले की प्रमुख झील है जिस सागर का केंद्र रही है |

प्रश्न -2. नौरादेही वन्यजीव अभ्यारण कहां पर है?

नौरादेही वन्यजीव अभ्यारण जैव विविधता के लिए जाना जाता है जो कि मध्य प्रदेश के सागर जिले में स्थित है |

प्रश्न -3. सागर जिले की स्थापना किसने की?

मध्य प्रदेश के सागर जिले की स्थापना महाराजा उधम सिंह 1660 में की थी|

प्रश्न- 4 .सागर विश्वविद्यालय की स्थापना कब हुई?

सागर विश्वविद्यालय की स्थापना 18 जुलाई 1940 को डॉ हरिसिंह गौर के द्वारा की गई जो कि किसी एक व्यक्ति के द्वारा अपनी संपत्ति को दान की गई भूमि पर यह विश्वविद्यालय निर्मित किया गया है|

प्रश्न -5 . सागर विश्वविद्यालय का नाम कब बदला गया?

दोस्तों सागर विश्वविद्यालय का नाम सन 1983 में डॉ हरिसिंह गौर विश्वविद्यालय के नाम पर रखा गया |

प्रश्न -6 .आबचंद की गुफा कहां पर है?

आबचंद की गुफाएं मध्य प्रदेश के सागर जिले के करीब 10 किलोमीटर की दूरी पर दमोह रोड पर गधेरी नदी के पास स्थित हैं |

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